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कुत्रा किती वर्षे जगतो

कुत्रा किती वर्षे जगतो, किचन में दाखिल होने से पहले ज़ाहिद ने अपने अंडरवेार में हाथ डाला और अंडरवेार में से अपने लंड को निकाल कर उसे अपनी शलवार में ही आज़ाद कर दिया. ता कि वो जी भर कर अपनी बहन के बदन से खेल कर उसे अपनी मौजूदगी और प्यास का अहसास दिला सके. कुछ देर बाद वो मेरी गोद से उतर गयी और मेरी पॅंट को खोलने लगी नीचे खिसकाया और फिर घुटनो के बल बैठ कर मेरे लंड से खेलने लगी मामी ने उपर से नीचे तक लंड पर अपनी जीभ फेरी तो मैं झुर्झुरा गया

अब वो लाख कोशिश कर रहे थे की और पुश करें ,लन्ड और भीतर ठेले लेकिन मंजू बाई के आगे उनकी सब कोशिस बेकार ,सुपाड़े के आगे एक मिलीमीटर भी उसने नहीं ठेलने दिया। पिंक पटोला , अञ्चल सर से बस छलकता सा ,थोड़ा थोड़ा सीधी मांग दिख रही थी और उसमें सिन्दूर दमक रहा था। ऊपर से नीचे गहने ,सिंगार और सब से बढ़ कर जिस तरह लाज से उनकी आँखे झुकी थीं ,जिस तरह उँगलियों में उन्होंने पल्लू हलके से घबड़ाते हुए पकड़ रखा था।

अरे यार हम लोगे तेरे घर से इतने दूर हैं , आफिस से दूर हैं , इस गली में कौन देखेगा ,कौन पहचानेगा। थोड़ी मौज मस्ती करते हैं न कुत्रा किती वर्षे जगतो नीलोफर से आज की मुलाकात ने शाज़िया की सोच और दिमाग़ को कुछ ही घंटो में मुकम्मल तौर पर बदल कर रख दिया था.

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  1. ज़ाहिद नही चाहता था कि उस की पॅंट में खड़े होते उस के लंड पर उस की अम्मी या बेहन की नज़र पड़े . इस लिए वो प्लेट अपनी हाथ में थामे हुए आम को अपनी बेहन के मोटे मम्मे समझ कर चूस्ता हुआ अपने कमरे में चला आया.
  2. उन्होंने सोशल मिडिया खंगालना शुरू किया , चमचा नंबर एक का तो कोई फेस बुक या कोई भी सोशल मीडिया में था ही नहीं पर , शिवलिंग का सच क्या है
  3. और पहला कौर मैंने अपने हाथ से खिलाया। उनकी टेस्ट बड्स ने जैसे विद्रोह कर दिया हो , चेहरा एकदम गिनगिना गया। साथ में दोनों होंठ इनके सासु के पिछवाड़े चिपके जोर से सक करते एकदम वैक्यूम क्लीनर की तरह , ... जीभ भी क्या कोई लंड से गाँड़ मारेगा उसी तरह अंदर बाहर गोल गोल , ...
  4. कुत्रा किती वर्षे जगतो...शाज़िया ने आज पहली बार अपने अलावा किसी और औरत को अपनी आँखों के सामने इस तरह हालत में पूरा नंगा देखा था. शाज़िया ने जब देखा कि नीलोफर तो बिना किसी शरम-ओ-हया के उस के सामने ही अपने कपड़े उतारने पर तूल गई है. तो उस ने नीलोफर की तरफ से ध्यान हटा कर अपनी नज़रें अपने मोबाइल फोन पर जमा कर उसे देखने लगी.
  5. यह कहते ही जमशेद ने अपनी बेहन के गुदाज चुतड़ों पर हाथ रख कर उस की गान्ड को ऊपर उठाया और दुबारा अपने मुँह के नज़दीक किया और अपने मुँह को फिर नीलोफर की चूत पर लगा दिया. जब मॉम के सामनेबैठकर अपनी स्टिच का काम वो दिखा रहे थे तो , मम्मी के चेहरे पर उनके काम के एप्रोवल की हलकी सी झलक से उनके चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ जाती थी ,

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चलते चलते मम्मी ने जिक्र कर दिया की हफ्ते दस दिन में हम लोग इनके मायके जाएंगे और लौट के साथ में इनकी ममेरी बहन को ,

ज़ाहिद ने अपना पूरा दबाव नीलोफर की पुष्ट पर डाला हुआ था. जिस की वजह से नीलोफर बुरी तरहा अपनी भाई के सीने से चिपटी हुई थी. और ज़ाहिद के झटकों की वजह से नीलोफर के बड़े बड़े मम्मे के निपल्स उस के भाई की सख़्त छाती से रगड़ खा रहे थे. इस वजह से नीलोफर को अपनी चुदाई का और भी मज़ा आ आने लगा. जो अंगड़ाई ली उन्होंने तो उनकी गोरी गोरी मांसल बाहें ,और अंगड़ाई लेते ही उनकी काँखे , जैसे तीन दिन की बढ़ी हुयी काली काली रोमावली , काँखों में.

कुत्रा किती वर्षे जगतो,नीलोफर तो इसी मोके की तलाश में थी.इसीलिए नीलोफर बिना किस झिझक शाज़िया की अम्मी की बात मान कर उन के साथ उन के घर चली आई.

मैं और मामी इस दौरान कुछ भी बात नही कर रहे थे बस धीरे धीरे अपनी चुदाई को आगे ले जा रहे थे मामी भी अपनी कमर उचका उचका कर मेरा साथ दे रही थी

एक बार हम सब लोग शादी में गए थे , सब लोग , बहुत भीड़ थी , जाड़े के दिन। सब रजाई ओढ़ के सो रहे थे , मैं भी लेटा और वो मेरे बगल में। बिजली चली गयी थी , रात में १२ से ४ पावर कट होता था। सब लोग एकदम गहरी नींद में ,मेरठ में आज का मौसम कैसा रहेगा

अच्छा बाबा ग़लती हो गई.अब की बार तुम्हारा गिफ्ट भी साथ ही दूँगा,अब गुस्सा थूक दो जानू ज़ाहिद ने फोन पर मिन्नत के अंदाज़ में नीलोफर से माफी माँगते हुए कहा. आजकल चैटिंग डेटिंग और व्हाट्सऐप के जमाने में कुछ छुपता है ,चीनू दी ने सब हाल खुलासा जीजू को पहले ही बता दिया था।

तुम तो काफ़ी जल्दी आ गये,क्यों सबर नही हो रहा नीलोफर ने ज़ाहिद को अपने ड्रॉयिंग रूम में बैठा कर दरवाज़े का परदा उस के आगे करते हुए पूछा.

ज्यों ही दोनो सहेलिया अपने अपने कपड़े पहन चुकीं.तो नीलोफर ने फिर से सोफे पर बैठे हुए शाज़िया को खैंच कर उस का सर अपनी गोद में रखा और बोली क्यों बनो मज़ा आया क्या .,कुत्रा किती वर्षे जगतो और वो जलेबिया जो तुम लाया करती थी क्या महक आती थी उनमे से अब वो कहाँ , निशा जब तुम पानी भरने मंदिर के नलके पे आती थी मैं तुम्हे देखता था कसम से जैसे ही तुम्हारी इन हिरनी जैसी आँखो से आँखे मिलते ही पता नही क्या हो जाता था बस वो दो पल की मुलाकात ही होंठो को मुस्कुराने की एक वजह दे जाती थी

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